पत्रकार अजीत अंजुम के खिलाफ एफआईआर की पत्रकार संगठनों ने निंदा की

नई दिल्ली। ढेर सारे पत्रकारों और पत्रकार संगठनों ने यूट्यूबर और संपादक अंजीत अंजुम के खिलाफ बिहार में किए गए एफआईआर की निंदा की है। गौरतलब है कि अजीत अंजुम इस समय बिहार के दौरे पर हैं और वहां वो चुनाव आयोग द्वारा संचालित किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान की रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

अंजुम ने 12 जुलाई को एक वीडियो अपलोड किया जिसमें उन्होंने साहेबपुर कमाल विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग की जा रही अनियमितता को उजागर किया था। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक उसमें ऐसे फार्मों को भी अपलोड कर दिया गया था जो पूरे भरे हुए नहीं थे।

उसके एक दिन बाद बेगूसराय जिला प्रशासन ने एक बयान जारी कर कहा कि यूट्यूब चैनल द्वारा किया गया दावा पूरी तरह से गलत है और उसको जनता में केवल भ्रम पैदा करने के गलत उद्देश्य से तैयार किया गया है। उसी दिन बीएलओ ने एक एफआईआर दर्ज किया जिसमें अंजुम पर ट्रेसपासिंग, आदेशों का उल्लंघन करने और सरकारी अफसर को अपनी ड्यूटी न करने देने और इसके साथ ही धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए। यह एफआईआर जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत दर्ज कराए गए थे।

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लिखा कि अजीत अंजुम के खिलाफ एक एफआईआर इसलिए दर्ज किया गया क्योंकि उन्होंने बिहार में एसआईआर में व्याप्त अनियमितता का पर्दाफाश किया? यह मैसेंजर को ही मार देने का क्लासिक उदाहरण है। वरिष्ठ पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की जगह चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन क्यों नहीं यह मान रहा है कि उन्होंने एक तुगलकी फरमान जारी करने का काम किया है जो न केवल समय के लिहाज से गैरव्यवहारिक है बल्कि पूरी प्रक्रिया ही दोषपूर्ण है जिससे केवल और केवल अराजकता पैदा होगी और जमीन पर लोगों की कठिनाइयां और बढ़ेंगी। मैसेंजर को शूट करना बंद करो।

डीजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन ने इसे सीधे-सीधे सच जानने के लिए की जाने वाली पत्रकारिता की स्वतंत्रता और लोगों के अधिकारों पर हमला करार दिया है।

फाउंडेशन ने कहा कि पहले जिला प्रशासन ने एक्स पर एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अंजीत अंजुम की कवरेज को गलतफहमी पैदा करने वाला बताया था। ये अस्पष्ट आरोप न तो विश्वसनीय हैं और न ही एफआईआर दर्ज करने के लिहाज से उनमें कोई तथ्य है। या तो अधिकारियों को पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों का सही और तथ्यपरक जवाब देना सीखना चाहिए। वरना लोकतांत्रिक मशीनरी के सहयोग न करने की स्थिति में पत्रकार जब अपने आप से सूचनाएं इकट्ठा करते हैं तो उन्हें किनारे खड़ा हो जाना चाहिए।

इसमें आगे कहा गया है कि अजीत अंजुम ने बिहार में चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों के उल्लंघन पर चिंता जाहिर की थी। यह ऐसा कुछ था जो एक पत्रकार की जिम्मेदारी के दायरे में आता है यह कोई अपराध नहीं है। इन वाजिब सवालों को हल करने की जगह चुनाव आयोग ने अपने एफआईआर के जरिये न केवल उन्हें डराने की कोशिश की है बल्कि उन सभी पत्रकारों को भी धमकाने की कोशिश की है जो जमीन पर जाकर रिपोर्टिंग करने की साहस कर रहे हैं। यह प्रेस को चुप कराने और असुविधाजनक सच्चाइयों को छुपाने की एक सोची-समझी और व्यवस्थित कोशिश है।  

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